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हम बड़ी जल्दी खड़े हो जाते हैं। चाहे वो दिल्ली में किसान का आत्मदाह हो, नेपाल में भूकंप हो, दामिनी बलात्कार केस हो, हम झट से खड़े हो गए हैं। ज़ाहिर यह भी है हज़ारों कर्ज़दार किसानों की पीड़ा से हम खड़े नहीं होते पर एक आत्महत्या से हम खड़े हो जाते हैं। अपने गली मोहलों के लड़कों को शय भी हम पीठ थपथपा के देते हैं और मोहले की किसी लड़की के साथ कुछ गलत होने पर भी हम खड़े हो जाते हैं। डैमों के उद्घाटनों पर हम तालियां पीटते हैं, उज्वाल भारत की तस्वीर पर 56 इंच का सीना फुला बैठते हैं और भूकंप, सुनामी आने पर खड़े हो जाते हैं। हाथ में मोमबत्तियां पकड़ देश प्रेमी नहीं बना जा सकता और ना ही तबाही की तसवीरें शेयर करने से 7.9 तीव्रता कम हो सकती है।

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कुछ किया जा सकता है तोह बहुत पहले खड़े हो कर हो सकता है। हम कितने ज़िमेदार हैं यह हम बाखूबी जानते हैं और ट्विटर के हैशटैग पर गुस्सा उतार IPL की तरफ हो लेने की मानसिकता हमारी अगली पीढ़ी को खड़े होने लायक भी नहीं छोड़ेगी। कम से हम ईमानदार तोह रहे। चाहे मज़ा करें पर कम से कम किसी के साथ खड़े होने का दिखावा कर  किसी का त्रासदी का मज़ाक ना बनाया जाए। भारत नेपाल की हर संभव मदद कर रहा है परंतु हमें अपनी इमारतों पर भी ध्यान देना होगा। हम बेपरवाह होकर अपने घरों से हाथ धो बैठेंगे और इंतज़ार करेंगे के कोई हमारे लिए खड़ा हो।

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ढही इमारतों में जब हम घरों के साथ किसी को खड़ा पाएंगे तोह दुःख होगा। क्योंकि खड़े होने मात्र से जीवन नही चलता। खबरों के चैनलों ने हमें भृष्ट बना दिया है। हम समाजवादी से पूंजीवादी बनाये जा रहे हैं।
– Gursimran Datla

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