मंटो टोर सुटिया जे ?

सआदत मंटो तमाम उम्र खुद को लिखता रहा। उसकी कहानियों पर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगा। उसकी कहानियों पर मुक़दमे दर्ज़ हुए। अदालतों में केस चले। उसने दर्द भरे शरीर को खींच खींच कर खुद को जजों के सामने पेश किया। हर मुक़दमे पर उसे बम्बई से लाहौर अदालत जाना पड़ता।
उसके ऊपर चले मुक़दमे, उसमें हुए बयानों-गवाहों और फैसले की प्रतियां मेरे सामने पड़ी हैं। कल रात कुछ बयानों और मुकदमों को पढ़ा भी मैंने। 
कैसे एक ख़ास तरह के लोग हर दौर में रहे हैं। मंटो जैसे। जो अपना अलग से कुआं खोदते हैं, चाहे उसका पानी कितना भी खारा क्यों न हो। 
दूसरे वो लोग जो उसकी कहानियों को कामुकता से जोड़ते रहे। उन्हें मात्र अश्लील कह कर खारिज करते, उनपे मुक़दमे चलाते रहे। तर्क क्या देते ज़रा गौर करना
– जी, 
मंटो अश्लील शब्द लिखता है, 
जैसे ? 
जैसे – आशिक़ ?
अगर आशिक़ अश्लील शब्द है तोह इसकी जगह क्या शब्द इस्तेमाल किया जाए ?
– अ.. यार शब्द कैसा रहेगा ?
अदालत में हंसी गूँज उठती।

मंटो के हस्त लिखे बयानों में, वो लिखता है –
“भाषा में बहुत कम अश्लील शब्द होते हैं। उनको इस्तेमाल करने का ढंग ही है, जो पवित्र से पवित्र शब्द को भी अश्लील बना देता है। कुर्सी भी अश्लील हो सकती है। घर की हंडिया भी। अगर उनको अश्लील ढंग से पेश किया जाए।”

मंटो की लिखी “टोबा टेक सिंह” ने मंटो को कहानी के खुदा की उपाधि दी। आज भी उसके कातब पे उसके हाथों से लिखा हुआ है –

“In the name of God, the Compassionate, the Merciful
Here lies Saadat Hasan Manto and with him lie buried all the secrets and mysteries of the art of short-story writing….
Under tons of earth he lies, still wondering who among the two is greater short-story writer: God or He.”

वो 6 कहानियां जिनपर मुक़दमे चले, मैं उन्हें कई बार पढ़ चूका हूँ, लेकिन हर बार एक नयी परत की तरह उनमें कुछ नया निकलता है। ठंडा गोश्त, बो, काली सलवार, धुयाँ, खोल दो, ऊपर नीचे और बीच में, सारी कहानियां महीन यथार्थ से बनी और बिना समाजिक स्वीकृति की परवाह किये। इसीलिए मंटो अब तक ज़िंदा रहा।

मंटो ने अदालत को एक ब्यान में लिखा – ” दो धर्मों को अलग किया जा सकता है, दो ज़मीनों को कानून को भी अलग किया जा सकता है, पर मर्द और औरत को एक दूसरे से दूर नही किया जा सकता।”

यह मंटो जैसा द्रष्टा ही था जिसने लिखा के –
“Hindustan had become free. Pakistan had become independent soon after its inception but man was still slave in both these countries — slave of prejudice … slave of religious fanaticism … slave of barbarity and inhumanity.”

और आज यह लिखे जाने के 60 साल बाद भी यह उतना ही सच है। मंटो समय के बहुत आगे का लिख गया था। तब लोग बहुत पीछे के थे। आज भी लोग बहुत पीछे के हैं। आज भी मर्द औरत का रिश्ता उसी तकरीरों से, नज़रों से और सवालों से हो कर गुज़रता है जैसे पहले गुज़रता था।

उसने एक ब्यान में लिखा –

“ज़माने के जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं, अगर आप उससे वाकिफ़ नहीं हैं तो मेरे अफसाने पढ़िये और अगर आप इन अफसानों को बरदाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि ज़माना नाक़ाबिले-बरदाश्त है। मेरी तहरीर(लेखन) में कोई नुक़्स नहीं । जिस नुक़्स को मेरे नाम से मनसूब किया जाता है, वह दरअसल मौजूदा निज़ाम का एक नुक़्स है। मैं हंगामा-पसन्द नहीं हूं और लोगों के ख्यालात में हैज़ान पैदा करना नहीं चाहता। मैं तहज़ीब, तमद्दुन, और सोसाइटी की चोली क्या उतारुंगा, जो है ही नंगी। मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, क्योंकि यह मेरा काम नहीं, दर्ज़ियों का काम है ।”

एक ऐसे ही केस में मंटो पर अपनी कहानी में अश्लील शब्द इस्तेमाल करने का केस चला। वो शब्द था “औरत की छाती”। 
इस पर मंटो ने कहा – “अगर में कहानी में किसी औरत की छाती का ज़िक्र करना चाहूँ तोह उसे औरत की छाती ही कहूँगा। औरत की छातियों को आप मूंगफली, मेज़ या उस्तरा नहीं बोल सकते।”

ऐसे कई केस मंटो पर चले जो बेहद दिलचस्प तोह हैं, पर अपने अंदर समाजिक कूटता समेटे हुए हैं। यह आज भी उसी मात्रा में मौजूद हैं।

आखिरी समय तक मंटो अदालतों के चक्कर काटता रहा। जब 1955 में मंटो मरा तोह रशीद ( उर्दू शायर) ने पंजाबी भाषा में कहा “मंटो टोर सुटेया जे ?” पंजाबी में कही इस बात का उर्दू या हिंदी में अनुवाद नहीं किया जा सकता

-Gursimran Datla

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