Thoughts on Ritesh Batra’s ‘Photograph’

रितेश बत्रा की नई फ़िल्म ‘फोटोग्राफ’ और कुछ इधर उधर के विचार –

आज बहुत दिनों के बाद किसी फिल्म पर लिख रहा हूँ। आज बहुत दिनों के बाद कुछ लिख रहा हूँ। आप जो करना चाहते हैं वो आप हमेशा नहीं कर सकते, वक़्त इतना दयालू नहीं है। धूप- छांव के मौसमों की तरह आप अपने आप से दूर-पास होते रहते हैं। मैं जैसे जैसे कुछ नया जानता जाता हूँ मुझे पता चलता जाता है के मैं कितना कम जानता हूँ। मैं परेशान ज्यादा हूँ, खुश कम हूँ। कभी कभी यह भी सवाल उठता है मेरे दिमाग में कि यह काबिलियत कोई काबिलियत है भी, या सिर्फ एक भृम है ?

कई लोग, कई समाज सिर्फ भृम में ही तोह जीवन गुजार देते हैं। कितना चांस है के मैं भी उनमें से एक होऊं ? जीवन की क्रूरता उसकी उलझन की जिद में है और मानव की क्रूरता, सब कुछ सुलझाने की हठ में है।
प्लेटो की गुफा में जब परछाई बनी थी तोह तब गुफा में हवा थी। अब गुफा से हवा जा चुकी है। अब परछाई तोह है पर रोशनी से बनी नही, हाथ से खींची हुई। नकली।

रितेश बत्रा समय लगा के फ़िल्म बनाते हैं और इकलौते ऐसे फिल्मकार हैं जो सामाजिक कुंठा और ना बराबरी से उठे जज़्बातों को मेमोरी कार्ड में स्टोर करने में सक्षम हैं। उनकी नई फिल्म फोटोग्राफ सामाजिक ना-बराबरी और एकेलेपन से उपजे नास्टैल्जिया का रेखाचित्र है। उनकी पहली फ़िल्म ‘लंचबॉक्स’ अगर भारतीय मध्यवर्ग के अस्तित्ववादी फलसफे का पहला पन्ना है तोह ‘फोटोग्राफ’ उसी किताब का दूसरा पन्ना है।
दोनों फिल्मों का वातावरण एक सा है। दोनों फिल्मों के किरदारों के खालीपन भी एक सा है। ‘फोटोग्राफ’ जब खुलती है तोह आपके चहेरे पर पूरी फिल्म के दौरान मुस्कुराहट रहती है और दिल में एक हल्की सी पीड़ा भी उठती है। मुम्बई में बसे गैर-मुंबईकरों की कहानी है।
मुस्कुराहट के नीचे दबी हुई इस पीड़ा को जगाना रितेश बत्रा का क्राफ्ट है , जिस से उन्होंने फ़िल्म में कई ओरिजिनल एक्सपेरिमेंट किये हैं जो बृहद मज़ेदार, भावुक और नए हैं। दो लोगों का ना बोलना और बैठे रहना कितना सुखद और इंटरेस्टिंग होता है, यह रितेश ने दोनों फिल्मों से बताया है। सिनेमा ऑडियो का माध्यम नहीं है।
फ़िल्म अपने विसुअल में मौजूदा समय की अतियथार्थवाद (Surreal) प्रस्तुति लगती है लेकिन इसकी लिखाई में छिपा है पूर्व पूंजीवादी (post-capitalism) युग का त्रासद। जब बाजार हमारी भावनाओं का सौदा कर, विफल खड़ा हुआ हमें दुबारा बुला रहा है, तब हम पुरातन (archaic) की तरफ दोबारा आकर्षित हो रहे हैं। हम लौटना चाहते हैं। बीते कल की और। आज को हमने इतना भयावह बना दिया है के आने वाले कल का सारा क्रेज खत्म हो गया है।

भारतीय फिल्म समीक्षकों को चाहे फ़िल्म में इतना कुछ ना मिला हो पर फ़िल्म के चाहने वालों और सिनेमा की परिभाषा पर विचार-चर्चा करने वालों को ‘फोटोग्राफ’ में बहुत कुछ मिलेगा। यह मार्मिक फ़िल्म है। हिंदी सिनेमा के घिसे पिटे सेंटिमेंटलिस्म से दूर।

फ़िल्म देखते हुए फ्रांसीसी फिल्ममेकर और फिलॉसफर ‘गाए देबोर्ड’ की किताब ‘तमाशबीनों का समाज’ के कुछ कांसेप्ट दिमाग में चलते हैं। ‘गाए देबोर्ड’ लिखता है के पूंजीवाद के शुरुआत में ध्यान ‘बनने ‘ (being) से ज्यादा ‘होने’ (having) पर दिया गया, और अब पूंजीवाद के बाद के दौर में सारा फोकस ‘होने’ (being) से शिफ्ट हो कर ‘दिखने’ (appear) पर हो गया है।

फ़िल्म में नूरी ( सान्या मल्होत्रा द्वारा निभाया गया बेहतरीन किरदार ) की तस्वीर उसके कोचिंग सेन्टर के बाहर लगे बिलबोर्ड पर लगी है, उसी कोचिंग सेन्टर, जहां से वो परे जाना चाहती है।

सान्या मल्होत्रा द्वारा निभाया गया किरदार जो फ़िल्म में, चार्टर अकाउंटेंट की टोपर विद्यार्थी है, आज के नौजवान, आज के युग का बेहतरीन चित्रण है। अमेरिका में MBA करने जा रहे लड़के द्वारा पूछने पर वो बताती है के वो अमरीका नहीं, गांव जाना चाहती है। खेती करना चाहती है। पेड़ के नीचे दोपहर को सोना चाहती है। सिनेमा में आज के युग की मानसिकता का इतना ओरिजिनल चित्रण कम ही देखने को मिलता है।

ज्ञात होता है के रितेश बत्रा इस समय के सच को समझ गए हों और उन्होंने किरदारों को नास्टैल्जिया से बांध दिया। रोमानियाई फिलॉसफर मिरसिया एलिडे ने इसे ‘शाश्वत वापसी’ ( eternal return) का नाम दिया है।
क्या नवउदारवाद, (neoliberal) तमाशे (spectacle) और उपभोक्तावाद (consumerism) दौर में शाश्वत वापसी ही आखरी रास्ता है क्या ? क्या हमें अपने पुरातन की तरफ लौटना होगा ? क्या पूंजीवाद, (capitalism) स्थानांतरगमन (migration) और भूमंडलीकरण (globalization) बीसवीं और इकीसवीं सदी के सबसे विफल एक्सपेरिमेंट रहे ?

ईनडिपेंडेंट सिनेमा इसलिए भी कारगर है क्योंकि वो सीमित साधनों का इस्तेमाल करता है। रितेश का काम इसलिए भी यादगार होता है क्योंकि वो अपने फ़िल्म में साउंड को बेहतरीन इस्तेमाल करते हैं। ऐसा ही बेहतरीन साउंड ददसिग्न आपको गुरविंदर सिंह की फिल्मों में मिलेगा। मुम्बई की सड़कों का खालीपन, लोकल ट्रेन से निकलती सीटियां आपके शब्दों से ज्यादा हिलाती हैं।

फिल्म के हीरो रफ़ी की माँ, उसकी होने वाली बहु नूरी को, अपने पुरखों से चली आयी पायल की जोड़ी देती है। मध्य वर्गीय परिवार से आई नूरी,हाथ में पायल पकड़ कर अपने स्टडी टेबल पर बैठी है तभी उसके घर में काम करने वाली बाई के पांव से आवाज़ की साउंड हाईलाइट होने लगती है। ऐसा दृश्य बनता है जैसे निर्देशक ने बिना कुछ कहे, समानता और एकतावादी संस्कृति की पोल खोल दी हो।

रितेश अलग अलग स्तरों पर फ़िल्म के किरदारों को लेकर चलते हैं। नवाजुदीन सिदिक़्क़ी का काम काफी सराहनीय है।
कुल मिला के फ़िल्म काफी कुछ दे जाती है, सिवाए एंडिंग के। पर एंडिंग किसको चाहिए ?

जैसा के गाए देबोर्ड आपानी किताब में लिखते हैं के – “खोए हुए बच्चों की तरह हम अपने अधूरे कारनामों को जीते हैं।” पहोटोग्राफ अधूरा कारनामा है। निर्देशक नही, इसे दर्शक पूरा करता है।

– Gursimran Datla

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s